चूडाकमणि हेयास्तु जन्ममसश्व जन्मभम् । रिक्ता ४ । ९ । १४ षष्ठी च पर्वाणि १५।३० प्रतिपच्च तिथिष्वपि ॥४४॥
गुरुभार्गवयोरस्ते बाल्यवार्द्धकयोरपि । केतूदयेऽपि नैव स्यान्मार्गे ज्येष्ठे तथा क्षुरम् ॥४५॥
क्षेपक -[ सूनोर्मांतरि गर्भिण्यां चूडाकर्म न कारयेत् । पंचमाब्दात्प्रागथौर्ध्वं गर्भिण्यामपि कारयेत् ॥ ] अथाक्षरारंभ : । हस्तत्रये ३ हरिद्वंद्वे २ पूर्वा ३ श्वे मृगपंचके ५ । मूले पूष्णि च नक्षत्रे बुधेऽर्के गुरुशुक्रयो : ॥४६॥
देवीथ्याने मीनचापे १२।९ लग्ने १ वर्षे च पंचमें ५ विद्यारंभोऽत्र वर्ज्याश्व षष्ठय ६ नध्यायरिक्तका : ॥४७॥
सौम्यायने शुभे मासि स्वाध्यायदिवसे शुभे । स्वे स्वे जीवबुधे शुक्रे लग्ने खेटबलान्विते । हेरंबं विष्णुं वाग्देवीं तथाऽश्र्यर्च्येष्टदेवता : । शुभेऽह्नि तु नर : कुर्याल्लिप्यारंभं सदा बुधै : ॥४८॥
परंतु जन्ममास जन्मनक्षत्र रिक्ता ४ । ९ । १४ षष्ठी ६ पर्व १५ । ३० प्रतिपदा १ तिथि और शुक्रगुरुका अस्त तथा बाल्यवृद्ध अवस्था , केतुका उदय , मार्गशिर जेष्ठ यह मास प्रथम क्षौर करानेमें त्यागने चाहिये ॥४४॥४५॥
क्षेषक -( यदि पुत्रकी माता गर्भिणी हो तो चौलकर्म नहीं करे , परंतु पांच ५ वर्षके उपरांत दोष नहीं है । ) ( अक्षरारंभमु . ) ह . चि . स्वा . श्र . ध . पू . ३ अश्वि . मृ . आ . पु . पु . आश्ले . मू . रे . इन नक्षत्रोंमें तथा बुध . रवि . शुक्र , गुरु वारोंमें बालकको अक्षरारंभ करावे ॥४६॥
और देवोके उठनेमें तथा मीन १२ धन ९ लग्नमें और पांचवें बरसमें विद्यारंभ करे परंतु षष्ठी ६ अनध्याय रिक्ता ४ । ९ । १४ त्याग देवे ॥४७॥
और उत्तरायण शुभमास स्वाध्वाय दिनमें तथा ब्राह्मण आदि वर्ण शुक्र , गुरु , बुधके बलसहित शुभ लग्नमें गणेश , विष्णु , सरस्वती इष्टदेवताओंको पूजके श्रेष्ठ दिनमें बालकको प्रथम अक्षरोंका आरंभ करावे तो शुभ है ॥४८॥
अथोपनयनम् । तत्र मुख्यकाल : व्रतबंधस्तु विप्राणां गर्भाद्वा जन्मतोऽष्टमे । षष्ठेऽब्दे सप्तमें मध्यो विद्याकामस्य पंचमे ॥४९॥
षष्ठे चैकादशेऽब्दे वा क्षत्रियाणामुदीरित : । वैश्यानां द्वादशेऽब्दे स्यादष्टमे गर्भतोऽपिवा ॥५०॥
अथ गौणकाल : । विप्रस्याषोडशाद्वषादाद्वाविंशात्तु भूमुजाम् । वैश्यानामाचतुर्विंशाद्नौण : काल उदाहत : ॥५१॥
अथ वर्णेशादिशुद्धि : । निजवर्णेशशखेशभास्वद्वागीश्वरेंदुषु । वीर्यवत्सु द्विजातीनां व्रतबंध : शुभप्रद : ॥५२॥
अथ वर्णेशा : । जीवशुक्रौ तु विप्रेशौ भूभुजां रवि - मंगलौ । विशोऽब्जो ज्ञश्व शूद्राणामंत्यजानां पति : शनि : ॥५३॥
अथ शाखेशा : । ऋवेदेशी गुरु : प्रोक्तो यजुवां भार्गव : पति : । सामवेदेश्वरो भौम : पतिश्वाथर्वणो बुध : ॥५४॥
( यज्ञोपवीतमु . ) ब्राह्मणोंको गर्भसे अथवा जन्मसे आठवें ८ बरसमें जनेऊ ( यज्ञोपवीत ) लेना श्रेष्ठ है और छठे ६ या सातवेंमें ७ लेना मध्यम है , यदि विद्या पढनेका इच्छा हो तो पांचवें ५ बरसमेंही लेलेवे ॥४९॥
और क्षत्रियोंकी छठे ६ या ग्यारहवें ११ बरस और वैश्योंकी बारहवें १२ या गर्भसे आठवें ८ वर्षमें लेना शुभ है ॥५०॥
( गौणकाल ) यदि ब्राह्मण आठवें वर्ष नहीं ले सके तो सोलह १६ वर्षतक अधिकार और क्षत्रियोंको बाईस २२ बरसतक तथा वैश्योंको चौबीस २४ बरसतक लेनेका अधिकार है ॥५१॥
( वर्णेशादिशुद्धि ) परंतु अपने अपने वर्णका स्वामी और शाखाका पति तथा सूर्य , गुरु , चंद्रमा बलवान् होनेसे उपनयन लेना शुभ है ॥५२॥
( बणोंके स्वामी ) गुरु , शुक्र , बाह्मण वर्णके स्वामी हैं , रवि , मंगल , क्षत्रियोंके . चंद्रमा वैश्योंका , बुध शुद्रोंका और शनैश्वर अंत्यजोंका स्वामी है ॥५३॥
ऋग्वेदका पति गुरु है , यजुर्वेदका शुक्र है . सामवेदका मंगल है और अथर्ववेदका पति बुध है ॥५४॥
अथ गुर्वादिशुद्धि : । व्रते गुरोबलं ज्ञेयं विवाहे यद्विवक्श्यते । चंद्रता राबलं पूर्वमुक्तं ग्राह्यं बटो : शुभम् ॥५५॥
जन्म १ त्रिदशमारिस्थ : ३ । १० । ६ पूजया शुभदौ गुरु : । व्रतोद्वाहे चतुर्थाष्टद्वादशस्थो ४ । ८ । १२ मृतिप्रद : ॥५६॥
अथाष्टमस्थादिगुरुपरिहार : । झष १२ चाप ९ कुलीर ४ स्थो जीवोऽप्यशुभगोचर : । अतिशोभनतां दद्याद्विवाहोपनयादिषु ॥५७॥
व्रते जन्म १ त्रिखारिस्थो ३।१०।६ जोवीऽपीष्टोऽर्चनात्सकृत् । शुभीऽतिकाले तुर्याष्टव्ययस्थो ४ । ८ । १२ द्विगुणार्चनात् ॥५८॥
सिद्धिर्नेंव गुरोर्यस्य वर्षे प्राप्तेऽष्टमे यदि । चैत्रे मीनगते भानौ तस्योपनयनं शुभम् ॥५९॥
जन्मभादष्टमे सिंहे नीचे वा १० शत्रुगे ३।६।२।७ गुरौ । मौंजीबध : शुभ : प्रोक्तश्वैत्रमीनगते रवौ ॥६०॥
( गुरुआदि शुद्धि ) यज्ञोपवीतमें गुरुका बल देखना और विवाहमें सूर्यका बल और चन्द्रताराका भी उपनयनमें बल देखनेसे बटु ( ब्राह्मण ) को शुभ होता है ॥५५॥
जन्मका १ , तीसरा ३ , दशवां १० , छटा ६ गुरु पूजा करके शुभ होता है और चौथा ४ आठवां ८ बारहवां १२ गुरु हो तो मृत्युकारक हैं ॥५६॥
( अष्टमस्थादि गुरुपरिहार ) यदि मीन १२ , धन ९ , कर्क ४ जा गुरु होवे तो विवाह यज्ञोपवीत आदिमें अशुभ भी जानना ॥५७॥
और जन्मका १ , तीसरा ३ , दशवां १० , छठा ५ , बृहस्पति एक १ पूजा करके श्रेष्ठ है और बालक बडा हो जावे तो चौथा ४ , आठवां ८ , बारहवां१२ दुगुनी पूजासे शुभ होता है ॥५८॥
और यदि बालक आठ ८ बरसका हो तब गुरु अशुभ स्थानमें हो तो चैत्रके मीनके सूर्यमें उसका यज्ञोपवीत श्रेष्ठ है ॥५९॥
और जन्मराशिसे गुरु आठवां हो या गुरु सिंह ५ मकर १० का हो या शत्रुके घरमें हो तो चैत्रमें मीनक सूर्यमें उपनयन श्रेष्ठ कहा है ॥६०॥