हिंदी सूची|हिंदी साहित्य|भजन|तुलसीदास कृत दोहावली| भाग २ तुलसीदास कृत दोहावली भाग १ भाग २ भाग ३ भाग ४ भाग ५ भाग ६ भाग ७ भाग ८ भाग ९ भाग १० भाग ११ भाग १२ भाग १३ भाग १४ भाग १५ भाग १६ भाग १७ भाग १८ भाग १९ भाग २० भाग २१ भाग २२ भाग २३ भाग २४ भाग २५ तुलसीदास कृत दोहावली - भाग २ रामभक्त श्रीतुलसीदास सन्त कवि आणि समाज सुधारक होते. तुलसीदास भारतातील भक्ति काव्य परंपरेतील एक महानतम कवि होत. Tags : dohavalidohetulsidasतुलसीदासदोहावलीदोहे भाग २ Translation - भाषांतर रामप्रेमके बिना सब व्यर्थ हैरसना साँपिनि बदन बिल जे न जपहिं हरिनाम ।तुलसी प्रेम न राम सों ताहि बिधाता बाम ॥हिय फाटहुँ फूटहुँ नयन जरउ सो तन केहि काम ।द्रवहिं स्त्रवहिं पुलकइ नहीं तुलसी सुमिरत राम ॥रामहि सुमिरत रन भिरत देत परत गुरु पाँय ।तुलसी जिन्हहि न पुलक तनु ते जग जीवत जायँ ॥सोरठाहृदय सो कुलिस समान जो न द्रवइ हरिगुन सुनत ।कर न राम गुन गान जीह सो दादुर जीह सम ॥स्त्रवै न सलिल सनेहु तुलसी सुनि रघुबीर जस ।ते नयना जनि देहु राम करहु बरु आँधरो ॥रहैं न जल भरि पूरि राम सुजस सुनि रावरो ।तिन आँखिन में धूरि भरि भरि मूठी मेलिये ॥प्रार्थनाबारक सुमिरत तोहि होहि तिन्हहि सम्मुख सुखद ।क्यों न सँभारहि मोहि दया सिंधु दसरत्थ के ॥रामकी और रामप्रेमकी महिमासाहिब होत सरोष सेवक को अपराध सुनि ।अपने देखे दोष सपनेहु राम न उर धरे ॥दोहातुलसी रामहि आपु तें सेवक की रुचि मीठि ।सीतापति से साहिबहि कैसे दीजै पीठि ॥तुलसी जाके होयगी अंतर बाहिर दीठि ।सो कि कृपालुहि देइगो केवटपालहि पीठि ॥प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान ।तुलसी कहूँ न राम से साहिब सील निधान ॥उद्बोधनरे मन सब सों निरस ह्वै सरस राम सों होहि ।भलो सिखावन देत है निसि दिन तुलसी तोहि ॥हरे चरहिं तापहि बरे फरें पसारहिं हाथ ।तुलसी स्वारथ मीत सब परमारथ रघुनाथ ॥स्वारथ सीता राम सों परमारथ सिय राम ।तुलसी तेरो दूसरे द्वार कहा कहु काम ॥स्वारथ परमारथ सकल सुलभ एक ही ओर ।द्वार दूसरे दीनता उचित न तुलसी तोर ॥तुलसी स्वारथ राम हित परमारथ रघुबीर ।सेवक जाके लखन से पवनपूत रनधीर ॥ज्यों जग बैरी मीन को आपु सहित बिनु बारि ।त्यों तुलसी रघुबीर बिनु गति आपनी बिचारि ॥तुलसीदासजीकी अभिलाषाराम प्रेम बिनु दूबरो राम प्रेमहीं पीन ।रघुबर कबहुँक करहुगे तुलसिहि ज्यों जल मीन ॥रामप्रेमकी महत्ताराम सनेही राम गति राम चरन रति जाहि ।तुलसी फल जग जनम को दियो बिधाता ताहि ॥आपु आपने तें अधिक जेहि प्रिय सीताराम ।तेहि के पग की पानहीं तुलसी तनु को चाम ॥स्वारथ परमारथ रहित सीता राम सनेहँ ।तुलसी सो फल चारि को फल हमार मत एहँ ॥जे जन रूखे बिषय रस चिकने राम सनेहँ ।तुलसी ते प्रिय राम को कानन बसहि कि गेहँ ॥जथा लाभ संतोष सुख रघुबर चरन सनेह ।तुलसी जो मन खूँद सम कानन बसहुँ कि गेह ॥तुलसी जौं पै राम सों नाहिन सहज सनेह ।मूँड़ मुड़ायो बादिहीं भाँड़ भयो तजि गेह ॥ N/A References : N/A Last Updated : January 18, 2013 Comments | अभिप्राय Comments written here will be public after appropriate moderation. Like us on Facebook to send us a private message. TOP