मार्कण्डेयजी बोले - महीपाल ! अब मैं देवदेव भगवान् विष्णुके पवित्र एवं पापनाशक अवतारोंका वर्णन करुँगा; उन्हें सुनो ॥१॥
महात्मा भगवान् विष्णुने जिस प्रकार मत्स्यरुप धारणकर [ प्रलयकालीन समुद्रमें खोये हुए ] वेद लाकर ब्रह्माजीको अर्पित किये और मधु तथा कैटभ नामक दैत्योंको मौतके घाट उतारा; फिर उन भगवान् विष्णुने जिस प्रकार कूर्मरुपसे मन्दराचल पर्वत धारण किया और महाकाय वराह अवतार लेकर [ अपनी दाढ़ोंपर ] इस पृथ्वीको उठाया तथा राजन् ! उन्हींके हाथसे जिस प्रकार महाबली, महापराक्रमी और महाकाय दितिकुमार हिरण्याक्ष मारा गया; राजन् ! फिर उन भगवानने नृसिंहरुप धारणकर पूर्वकालमें जिस प्रकार देवताओंके शत्रु हिरण्यकशिपुका वध किया; और राजकुमार ! जिस प्रकार उन महात्माने वामनरुप होकर पूर्वकालमें राजा बलिको बाँधा तथा इन्द्रको ( फिरसे ) त्रिभुवनका अधीश्वर बना दिया; और राजन् ! भगवान् विष्णुने श्रीरामचन्द्रका अवतार धारणकर जिस प्रकार रावणकी मारा एवं देवताओंके लिये कण्टकरुप अद्भुत राक्षसोंका उनके गणोंसहित संहार कर दिया; फिर पूर्वकालमें परशुराम - अवतार ले, जिस प्रकार क्षत्रियकुलका ;उच्छेद किया तथा बलभद्ररुपसे जिस प्रकार प्रलम्बादि दैत्योंका वध किया; कृष्णरुप होकर कंस आदि देवशत्रु दैत्योंका जिस तरह संहार किया; इसी प्रकार कलियुग प्राप्त होनेपर जिस प्रकार भगवान् नारायण बुद्धरुप धारण करेंगे; फिर कलियुग समाप्त होनेपर जिस प्रकार वे कल्किरुप धारणकर म्लेच्छोंका नाश करेंगे, वह सब वृत्तान्त उसी प्रकार मैं तुमसे कहूँगा ॥२ - १०॥
भूपाल ! जो एकाग्रचित्त होकर मेरेद्वारा बताये जानेवाले अनन्त भगवान् विष्णुके इन पराक्रमोंका श्रवण करेगा, वह सब पापोंसे मुक्त होकर भगवानके अत्यन्त उदार परमपदको प्राप्त होगा ॥११॥
इस प्रकार श्रीनरसिंहपुराणमें ' श्रीहरिके अवतारोंकी अनुक्रमणिका ' ( गणना ) विषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥३६॥